“आखिर चल क्या रहा है साहब?” हाईकोर्ट की फटकार के बाद भी पुलिस महकमे की चुप्पी बरकरार, निलंबित IPS रतनलाल डांगी केस में सिस्टम का घिनौना खेल बेनकाब

बिलासपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर वर्दी की ताकत के आगे इंसाफ की उम्मीद कितनी बेबस हो जाती है। निलंबित IPS रतनलाल डांगी के खिलाफ महिला उत्पीड़न के गंभीर मामले में जब पूरा पुलिस महकमा ही चुप्पी साधे बैठा रहा, तो आखिरकार छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को खुद आगे आकर पूछना पड़ा – आखिर चल क्या रहा है? यह सवाल अब सिर्फ कोर्ट का नहीं, बल्कि हर उस आम नागरिक का बन चुका है, जो यह देखकर हैरान है कि जब आरोपी खुद वर्दीधारी हो, तो जांच की रफ्तार कछुए से भी धीमी क्यों हो जाती है।

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“जवाब दो साहब” – कोर्ट ने पूछा तो पुलिस के पास था सिर्फ मौन

निलंबित IPS रतनलाल डांगी केस की सुनवाई में जो हुआ, वो किसी भी आम इंसान का सिर चकरा देने के लिए काफी है। कोर्ट ने बड़े साफ शब्दों में पुलिस विभाग से जवाब मांगा था, लेकिन जवाब में मिली सिर्फ खामोशी। जब जवाब ही पेश नहीं हुआ, तो हाईकोर्ट को अपनी नाराजगी जाहिर करनी पड़ी। सोचिए जरा, जिस विभाग का काम खुद कानून का पालन कराना है, वही विभाग कोर्ट के आदेश को इतनी सहजता से नजरअंदाज कर दे – आखिर चल क्या रहा है इस सिस्टम में? क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या फिर जानबूझकर मामले को लटकाने की कोई सुनियोजित रणनीति?

अब कोर्ट ने सख्त तेवर दिखाते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर शपथपत्र के साथ जवाब देने का फरमान सुना दिया है। और चेतावनी भी साफ है – अगर तय समय में जवाब नहीं आया, तो 29 सितंबर को खुद ऑफिसर-इन-चार्ज को कोर्ट के कठघरे में हाजिर होना पड़ेगा। अब देखना यह है कि क्या इस बार महकमा जागता है, या फिर कोर्ट की एक और तारीख यूं ही “आखिर चल क्या रहा है” के सवाल के साथ गुजर जाएगी।

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योग सिखाने के बहाने शुरू हुआ खेल, फिर आया धमकियों का दौर

अब बात करते हैं इस पूरे मामले की जड़ की। पीड़िता, जो पेशे से एक योगा टीचर हैं, का आरोप है कि निलंबित IPS रतनलाल डांगी ने अपनी व्यस्तता का हवाला देकर वीडियो कॉल के जरिए उनसे योग सीखना शुरू किया। अब सुनने में तो यह बड़ा सामान्य लगता है – एक व्यस्त अधिकारी, जो अपने स्वास्थ्य के लिए वीडियो कॉल पर योग सीख रहे हैं। लेकिन पीड़िता के आरोपों के मुताबिक, यह “योग क्लास” जल्द ही कुछ और ही रंग दिखाने लगी। आरोप है कि व्हाट्सऐप पर आपत्तिजनक संदेश भेजे जाने लगे, और वीडियो कॉल के दौरान अशोभनीय व्यवहार किया जाने लगा। और जब पीड़िता ने विरोध जताया, तो योग सिखाने वाले अधिकारी का असली रंग सामने आया – धमकियां शुरू हो गईं, परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी, पति के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराने की धमकी। यह कैसा “योगाभ्यास” था, जिसमें शांति और अनुशासन सिखाने के बजाय डर और दबाव का पाठ पढ़ाया गया? आखिर चल क्या रहा है, जब एक वर्दीधारी अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल इस तरह के दुर्व्यवहार के लिए करने से भी नहीं हिचकता?

निलंबित IPS रतनलाल डांगी

DGP से लेकर गृह सचिव तक गुहार, फिर भी कार्रवाई सिफर

पीड़िता ने चुपचाप यह सब सहने के बजाय हिम्मत दिखाई और 15 अक्टूबर 2025 को खुद DGP के सामने विधिवत शिकायत दर्ज कराई। जांच के लिए दो आईपीएस अधिकारियों – आनंद छाबड़ा और मिलना कुर्रे – को जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन जब महीनों बाद भी कुछ ठोस नहीं हुआ, तो पीड़िता को 20 अप्रैल 2026 को केंद्र सरकार के गृह विभाग सचिव और राज्य सरकार के गृह सचिव तक गुहार लगानी पड़ी। सोचिए, एक आम महिला को इंसाफ पाने के लिए कितने दरवाजे खटखटाने पड़े, कितनी बार अपनी पीड़ा दोहरानी पड़ी। इसके बावजूद जब कहीं से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तब जाकर पीड़िता को अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू के जरिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। आखिर चल क्या रहा है, जब सिस्टम के हर स्तर पर शिकायत करने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी पर कोई आंच तक नहीं आती?

जांच अधिकारी पर ही उठे सवाल – लोमड़ी को मुर्गी की रखवाली?

निलंबित IPS रतनलाल डांगी मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पीड़िता की ओर से खुद जांच प्रक्रिया पर ही गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं का आरोप है कि जिन अधिकारियों को जांच सौंपी गई है, वही आरोपी अधिकारी को बचाने की कोशिश में जुटे हैं। और तो और, जांच अधिकारियों में शामिल IG आनंद छाबड़ा के खिलाफ खुद महादेव सट्टा एप मामले में आपराधिक प्रकरण विचाराधीन बताया जा रहा है। अब जरा सोचिए, जिस अधिकारी पर खुद एक बड़े आपराधिक मामले की तलवार लटक रही हो, उसे इतने संवेदनशील मामले की जांच सौंप दी गई! यह कैसा न्याय है? क्या यही वजह नहीं कि पीड़िता को यह डर सता रहा है कि जांच निष्पक्ष होने के बजाय सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह जाएगी? आखिर चल क्या रहा है, जब जांच करने वालों की खुद की नीयत पर ही सवालिया निशान लग रहे हों?

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संपत्तियों की जांच की मांग, लेकिन फाइलें अब भी बंद

पीड़िता ने सिर्फ उत्पीड़न का आरोप लगाकर ही चुप्पी नहीं साधी, बल्कि IPS रतनलाल डांगी की कथित अवैध चल-अचल संपत्तियों की भी जांच की मांग की। शिकायत में रायपुर, धरमपुरा, राजिम, कटघोरा, बिलासपुर के साथ-साथ राजस्थान के विभिन्न स्थानों पर मौजूद कथित संपत्तियों का उल्लेख किया गया। लेकिन आरोप है कि इन संपत्तियों से जुड़ी शिकायत की भी उचित जांच नहीं की गई। यह सुनकर कोई भी पूछ बैठेगा – आखिर चल क्या रहा है? जब एक अधिकारी पर उत्पीड़न के साथ-साथ अवैध संपत्ति जुटाने के भी आरोप हों, तब भी जांच की सुई इतनी धीमी क्यों घूम रही है?

अगली सुनवाई 29 सितंबर, अब सबकी निगाहें कोर्ट पर

फिलहाल हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है, और चेतावनी दी है कि जवाब नहीं आने पर ऑफिसर-इन-चार्ज को खुद हाजिर होना पड़ेगा। 12 अगस्त की सुनवाई के बाद जब जवाब नहीं आया, तो 2 सितंबर की सुनवाई में कोर्ट की नाराजगी सामने आई। अब अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है, और पूरे प्रदेश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस बार पुलिस महकमा अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, या फिर एक और तारीख यूं ही “जवाब लंबित” के नाम गुजर जाएगी।

आखिर में सवाल वही है, जो हर आम नागरिक के मन में उठ रहा है – आखिर चल क्या रहा है इस पूरे मामले में? क्या एक निलंबित IPS अधिकारी होने की वजह से जांच इतनी सुस्त है? क्या वर्दी की ताकत आज भी इंसाफ की रफ्तार पर भारी पड़ रही है? क्या पीड़िता को आखिरकार वो न्याय मिलेगा, जिसके लिए उसने DGP से लेकर हाईकोर्ट तक का सफर तय किया? फिलहाल जवाब का इंतजार है, और 29 सितंबर की तारीख यह तय करेगी कि सिस्टम आखिर जागता है या फिर वही पुरानी चाल चलता रहता है।

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