रायपुर। राजधानी के सेक्टर-18 में बन रहा लोक भवन परिसर, जो आने वाले वक्त में प्रदेश के सत्ता-तंत्र की एक और पहचान बनने वाला था, अब एक अलग वजह से चर्चा में है। यहां वरिष्ठ अधिकारियों के लिए बनाए जा रहे आवासों में हुए एचवीएसी यानी हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग के काम को लेकर एक ऐसा सवाल खड़ा हुआ है, जिसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं, आखिर जो काम अधूरा था, उसका भुगतान पूरा कैसे हो गया? दिल्ली में “हाजिरी”, रायपुर में हलचल ! साय साहब की फ्लाइंग विजिट ने छत्तीसगढ़ भाजपा में मचाई खलबली!

यह सवाल सुनने में जितना सीधा लगता है, इसके पीछे छिपी कहानी उतनी ही उलझी हुई बताई जा रही है। एक शिकायत ने लोक भवन से जुड़े इस पूरे मामले को हवा दी है, और अब लोक निर्माण विभाग के गलियारों में इस पर खुसर-फुसर तेज हो गई है।
जब लोक भवन परिसर की ईंट-गारे से पहले फाइलें दौड़ पड़ीं
शिकायत में साफ आरोप लगाया गया है कि लोक भवन परिसर में वरिष्ठ अधिकारियों के आवासों में जो एचवीएसी सिस्टम लगाया जाना था, वह कई जगहों पर तय मापदंडों के मुताबिक पूरा ही नहीं हुआ। न पूरी फिटिंग, न तय मानकों के अनुरूप उपकरण, न वह गुणवत्ता जिसका दावा कागजों में किया गया. बावजूद इसके, संबंधित कंपनी को भुगतान की पूरी प्रक्रिया निपटा दी गई। यानी काम की चादर आधी बिछी और बिल पूरा भर दिया गया। छत्तीसगढ़ PWD की आधिकारिक वेबसाइट
सरकारी दफ्तरों में आमतौर पर एक कहावत चलती है, “पहले काम, फिर दाम।” लेकिन लोक भवन के इस मामले में लगता है क्रम ही उलट दिया गया। सवाल यह है कि जब काम की गुणवत्ता और पूर्णता का सत्यापन किए बिना भुगतान नहीं होना चाहिए, तो फिर यहां वह प्रक्रिया कहां गायब हो गई, जो हर सरकारी ठेके की रीढ़ मानी जाती है?
शिकायत के बाद विभाग में मची खलबली
जैसे ही लोक भवन से जुड़ी यह शिकायत सामने आई, लोक निर्माण विभाग में हलचल मच गई। शिकायतकर्ता ने पूरे प्रकरण की तकनीकी और वित्तीय, दोनों स्तर पर जांच कराने की मांग की। यह मांग इतनी वजनदार साबित हुई कि विभाग के प्रमुख अभियंता कार्यालय को इसे गंभीरता से लेना पड़ा, और आखिरकार जांच के औपचारिक निर्देश जारी कर दिए गए।
गौर करने वाली बात यह है कि जिस तेजी से यह मामला संज्ञान में आते ही जांच के आदेश तक पहुंचा, वैसी ही तेजी अगर मूल काम की निगरानी में दिखाई गई होती, तो शायद यह विवाद खड़ा ही न होता। लेकिन जैसा कि सरकारी तंत्र में अक्सर देखा जाता है, निगरानी तब जागती है, जब शिकायत की चिट्ठी मेज पर आ जाए।
लोक भवन परिसर में ‘साहबों’ की कोठी, सरकारी खजाने की चोट
इस पूरे प्रकरण को खास बनाने वाली बात यह है कि जिन आवासों में यह काम हुआ, वे कोई आम सरकारी क्वार्टर नहीं, बल्कि लोक भवन के वरिष्ठ अधिकारियों के आवास हैं। यानी जिन दीवारों में यह एसी-हीटिंग सिस्टम लगना था, वे दीवारें उन्हीं अधिकारियों की हैं, जिनके भरोसे विभागीय अनुशासन और वित्तीय अनुशासन दोनों टिके होते हैं।
आरोप है कि निर्धारित मापदंडों के अनुसार काम पूरा नहीं होने के बावजूद भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। जाहिर है, जब खुद “साहबों” के आवास ही इस विवाद के केंद्र में हों, तो सवाल सिर्फ ठेकेदार की नीयत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भी पूछा जाना लाजमी है कि निरीक्षण और सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों ने आंखें क्यों मूंदी रखीं? क्या यह चूक थी, लापरवाही थी, या फिर किसी सोची-समझी सहूलियत का नतीजा?
भंडार क्रय नियमों की अनदेखी — मिलीभगत का आरोप
लोक भवन से जुड़ी शिकायत में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है, जो इस मामले को और पेचीदा बना देता है। आरोप है कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से भंडार क्रय नियमों यानी स्टोर परचेज रूल्स की खुलेआम अनदेखी की गई। यह वे नियम हैं, जो सरकारी खरीद और भुगतान प्रक्रिया की रीढ़ माने जाते हैं, ताकि हर पाई का हिसाब हो, हर काम का सत्यापन हो, और सरकारी खजाने से एक रुपया भी बिना जांचे-परखे बाहर न जाए।
अगर यह आरोप सही साबित होता है, तो इसका मतलब है कि यह मामला सिर्फ एक ठेकेदार की गड़बड़ी भर का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में सेंध लगने जैसा है। शिकायत में सरकारी राशि के दुरुपयोग की आशंका जताई गई है, और यही वह बिंदु है जो इस पूरे प्रकरण को “गुणवत्ता विवाद” से आगे बढ़ाकर “वित्तीय अनियमितता” की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
15 दिन की डेडलाइन ! घड़ी की टिक-टिक शुरू
लोक भवन प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए जांच अधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे पूरे प्रकरण की पड़ताल कर 15 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। यह समयसीमा बताती है कि विभाग भी इस मामले को हल्के में नहीं ले रहा, या कम से कम कागजों पर तो यही दिखाना चाह रहा है।
अब जांच में यह साफ होना बाकी है कि आखिर एचवीएसी का काम कितना पूरा हुआ, मौके पर वास्तव में क्या-क्या इंस्टॉल किया गया, कौन-से उपकरण और सामग्री इस्तेमाल हुई, और सबसे अहम — भुगतान किन दस्तावेजों और किन मापदंडों के आधार पर किया गया। अगर काम अधूरा था, तो वह “कागजी पूर्णता प्रमाणपत्र” किसने और किस आधार पर जारी किया, जिसके सहारे भुगतान की फाइल आगे बढ़ी?
सवालों की फेहरिस्त, जो अब भी अनुत्तरित
इस पूरे प्रकरण ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं —
- अगर काम अधूरा था, तो भुगतान की फाइल किसकी मंजूरी से आगे बढ़ी?
- मौके का निरीक्षण किसने किया, और उसने क्या रिपोर्ट दी?
- क्या पूर्णता प्रमाणपत्र वास्तविक स्थिति के आधार पर जारी हुआ, या सिर्फ औपचारिकता निभाई गई?
- भंडार क्रय नियमों की अनदेखी किसके स्तर पर हुई — ठेके के आवंटन में, माप में, या भुगतान की मंजूरी में?
- क्या यह अकेला मामला है, या लोक भवन परिसर के अन्य कार्यों में भी ऐसी ही “सहूलियतें” बरती गई हैं?
लोक भवन परिसर निर्माण की गुणवत्ता से आगे बढ़ता मामला
शुरुआत में लोक भवन का यह प्रकरण केवल एक तकनीकी शिकायत जैसा लग सकता है — कि एसी ठीक से नहीं लगा, या हीटिंग सिस्टम अधूरा रह गया। लेकिन जैसे-जैसे परतें खुल रही हैं, यह साफ होता जा रहा है कि मामला निर्माण कार्य की गुणवत्ता से कहीं आगे निकल चुका है। अब इसकी आंच अनुबंध की शर्तों तक पहुंच रही है, माप और प्रमाणन की प्रक्रिया तक पहुंच रही है, बिलों की सत्यता तक पहुंच रही है, और सबसे अहम — उन अधिकारियों की भूमिका तक पहुंच रही है, जिनके हस्ताक्षर से यह पूरी भुगतान प्रक्रिया संभव हुई।
यही वजह है कि अब यह सिर्फ “ठेकेदार बनाम विभाग” का मामला नहीं रह गया, बल्कि इसमें विभागीय जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है।
जांच पूरी होने पर खुलेगा असली राज
अब हर किसी की निगाहें लोक भवन प्रकरण की उस जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में विभाग के सामने पेश होनी है। इस रिपोर्ट से यह साफ होगा कि आखिर मौके पर काम कितना हुआ, भुगतान कितना और किस आधार पर किया गया, कार्य की गुणवत्ता और तय मापदंडों में कितना फासला रहा, और निरीक्षण व प्रमाणन प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध रही।
अगर शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल एक विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। इसका दायरा सरकारी राशि के दुरुपयोग की जांच से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और आगे अनुशासनात्मक व वित्तीय कार्रवाई तक जा सकता है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि प्रारंभिक जांच के बाद मामला ऑडिट, सतर्कता जांच या इससे भी आगे की प्रक्रियाओं तक पहुंच जाता है, अगर प्रारंभिक निष्कर्ष गंभीर पाए जाएं।
सरकारी सिस्टम पर उठता एक बड़ा सवाल
लोक भवन का यह मामला अकेले में भले एक छोटी शिकायत जैसा दिखे, लेकिन यह उस बड़े सवाल को फिर से सतह पर ले आया है, जो अक्सर सरकारी निर्माण कार्यों को लेकर उठता रहा है — निगरानी और जवाबदेही की कड़ी आखिर कहां टूटती है? क्या यह सिर्फ इंसानी लापरवाही का नतीजा है, या फिर सिस्टम में ही ऐसी खामियां हैं जिनका फायदा उठाना आसान हो जाता है?
जब बात खुद उन अधिकारियों के आवासों की हो, जिनके भरोसे यह पूरा तंत्र चलता है, तो जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। आखिर अगर “साहबों” की अपनी कोठी में हुए काम की जांच-परख में ही ढिलाई बरती जा सकती है, तो आम जनता से जुड़ी योजनाओं और निर्माण कार्यों की निगरानी कितनी चौकस होगी — यह सवाल अपने आप में गंभीर है।
फिलहाल इंतजार, लेकिन सवाल कायम
फिलहाल लोक भवन का पूरा मामला जांच अधिकारी की मेज पर है, और 15 दिन की तय समयसीमा के भीतर सच्चाई सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन तब तक के लिए बड़ा सवाल यही बना हुआ है — जब काम पूरा नहीं हुआ था, तो भुगतान की फाइल इतनी तेजी से कैसे दौड़ गई? किसने हस्ताक्षर किए, किसने सत्यापन किया, और किसने आंखें मूंद लीं?
जांच रिपोर्ट ही तय करेगी कि यह मामला महज एक प्रशासनिक चूक था, या फिर किसी बड़ी गड़बड़ी की परतें अभी खुलनी बाकी हैं। लेकिन इतना तय है कि लोक भवन के इन आवासों में लगा एसी भले ही कमरों को ठंडा रखने के लिए लगाया गया हो, इस पूरे प्रकरण ने विभाग के भीतर माहौल गरमा जरूर दिया है।

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