बिलासपुर। सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन यह सच है कि एक आदमी सरकारी कागजों में अपनी असली मौत से तीन दिन पहले ही मर चुका था। यह कोई भूतिया किस्सा नहीं है, बल्कि बिलासपुर के सेंदरी क्षेत्र में सामने आया एक खुला जमीन घोटाला है। नगर निगम ने मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी किया 19 अक्टूबर 2023 को, जबकि तत्कालीन पटवारी ने फौती नामांतरण का प्रतिवेदन तहसीलदार के सामने पहले ही यानी 16 अक्टूबर को पेश कर दिया था। सीधी भाषा में कहें तो कागज पहले बना और आदमी बाद में मरा। इसी वजह से इस जमीन घोटाला को लोग अब टाइम मशीन वाला कारनामा कहने लगे हैं, जहां पटवारी की कलम भविष्य पहले से लिख देती है।
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जमीन घोटाला : बीस हजार वर्गफीट जमीन, हर कदम पर गड़बड़ी
यह जमीन घोटाला किसी छोटी-मोटी जमीन का मामला नहीं है, बल्कि करीब 20 हजार वर्गफीट के बड़े टुकड़े का है, जो खसरा नंबर 2108/2 में दर्ज था। यह जमीन पहले जेके एस प्लास्टिक फर्म और कृष्णलाल गोस्वामी के नाम संयुक्त रूप से चढ़ी हुई थी। आरोप है कि इनमें से एक साझीदार को कागजों पर मृत दिखाकर रिकॉर्ड से उसका नाम हटा दिया गया, और यह सब इतनी जल्दबाजी में किया गया कि असली मृत्यु प्रमाण-पत्र आने का इंतजार तक नहीं किया गया। पहले फौती का कागज तैयार हुआ, उसके बाद असली मौत हुई—और यही इस जमीन घोटाला की नींव बनी।
नाम हटते ही जमीन का रुख भी बदल गया। शिकायत के मुताबिक यही विवादित जमीन बाद में तत्कालीन पटवारी नवीन त्रिपाठी की सास गीता पटेल और पति कौशल पटेल के नाम खरीदी गई, और वहां प्लॉटिंग भी कर दी गई। यानी जिस पटवारी ने फौती नामांतरण की फाइल आगे बढ़ाई, ठीक उसी के परिवार के नाम पर जमीन भी दर्ज हो गई। कागज बना, नाम कटा, जमीन बिकी और प्लॉटिंग हुई—यह पूरा जमीन घोटाला मानो एक ही सांस में अंजाम तक पहुंचा दिया गया।
प्रशासन के पास बस एक ही जवाब—”जांच चल रही है”
मामला सामने आए करीब एक महीना बीत चुका है, लेकिन जांच अब तक कहीं नतीजे तक नहीं पहुंची है। तत्कालीन एसडीएम मनीष कुमार साहू और तहसीलदार प्रकाशचंद साहू ने शुरुआत में शिकायत मिलने की बात मानते हुए जांच का भरोसा जरूर दिलाया था, लेकिन एक महीना बीतने के बाद भी न तो कोई रिपोर्ट सामने आई है और न ही किसी पर कार्रवाई हुई है। पटवारी पर लगे आरोप गंभीर हैं, दस्तावेजों की तारीखों में साफ गड़बड़ी दिख रही है, और उसी के रिश्तेदारों के नाम जमीन खरीदे जाने का ठोस सबूत भी मौजूद है। इसके बावजूद न निलंबन हुआ है, न विभागीय कार्रवाई, न ही एफआईआर दर्ज हुई है। सिर्फ एक ही जवाब बार-बार दोहराया जा रहा है कि जांच जारी है, जिससे यह जमीन घोटाला अब सिर्फ जमीन के विवाद तक सीमित न रहकर प्रशासन की नीयत पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। बिलासपुर जिला प्रशासन
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जमीन घोटाला पर प्रशासन से पूछे जा रहे पांच सीधे सवाल
पहला सवाल यह है कि 19 अक्टूबर का मृत्यु प्रमाण-पत्र और 16 अक्टूबर का फौती प्रतिवेदन—यह विरोधाभास आखिर हुआ कैसे, और किस आधार पर 16 अक्टूबर को मौत मान ली गई थी।
दूसरा सवाल यह है कि एक महीना गुजर जाने के बावजूद जिम्मेदार कर्मचारी पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
तीसरा सवाल यह है कि जमीन की खरीद में पटवारी की सास का नाम सामने आने के मामले की जांच कब पूरी होगी।
चौथा सवाल यह है कि नामांतरण की पूरी प्रक्रिया में और कौन-कौन से अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे, और उनकी भूमिका कब तय की जाएगी।
पांचवां सवाल यह है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो एफआईआर दर्ज कराने और विभागीय कार्रवाई करने की जिम्मेदारी आखिर कौन उठाएगा।
इन पांचों सवालों का जवाब अब तक प्रशासन की तरफ से नहीं आया है, और यही खामोशी इस जमीन घोटाला को और गहरा बना रही है।
अब निशाने पर सिर्फ पटवारी नहीं, पूरा सिस्टम
ग्रामीणों का कहना है कि इस जमीन घोटाला की जांच सिर्फ एक पटवारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनकी मांग है कि फौती नामांतरण से लेकर नामांतरण आदेश और जमीन की आगे की खरीद-बिक्री तक जुड़े हर दस्तावेज की गहराई से जांच होनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि इस पूरे मामले में अकेला पटवारी शामिल था या पूरी चेन ने मिलकर यह खेल खेला। ग्रामीणों का तर्क सीधा है—अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो पटवारी को साफ-साफ क्लीन चिट दी जानी चाहिए, ताकि बेवजह किसी की बदनामी न हो। लेकिन अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो फिर निलंबन और कानूनी कार्रवाई में देरी की कोई वजह नहीं बनती।

एक महीने की चुप्पी, सवाल अब भी बरकरार
जिस तेजी से फौती नामांतरण की फाइल आगे बढ़ाई गई, उस तेजी का आधा हिस्सा भी अगर जांच में लगाया जाता, तो अब तक इस जमीन घोटाला का फैसला सामने आ चुका होता। लेकिन यहां हालात उलटे हैं—गड़बड़ी करने में रफ्तार दिखी, और जांच करने में सुस्ती। अब गेंद पूरी तरह जिला प्रशासन के पाले में है, कि वह इस जमीन घोटाला को किसी ठोस कार्रवाई तक ले जाता है या फिर यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह किसी अलमारी में दबकर रह जाता है। जब तक जवाब नहीं मिलता, तब तक यह सवाल जिंदा रहेगा कि एक पटवारी की कलम में इतनी ताकत आई कहां से, कि वह मौत की तारीख तक बदल सकी।

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